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चमगादड़ के वशीकरण तांत्रिक टोटके

  कोई भी चमगादड़ का प्रयोग कई प्रकार के वशीकरण तांत्रिक टोटके द्वारा अपने कार्य की सिद्धि कर सकता है|चमगादड़ एक ऐसा  पंछी है जो देखने मे बेशक सुंदर न हो और न ही किसी भी प्रकार से आकर्षक हो। बहुत से लोग इसे अशुभ भी मानते है। पर कहते है ना कि यहाँ हर एक चीज़ की अपनी कीमत होती है। जी हाँ दोस्तों चमगादड़ जैसे पंछी की भी एक खासियत यह है कि वशीकरण तांत्रिक टोटकों मे इसका इस्तेमाल बड़ा कारगर माना जाता है। तो चलिए जानते है ऐसे कुछ टोटके जिनको सफल करने मे यह चमगादड़ मददगार है। अगर कोई व्यक्ति आपको बड़ा परेशान कर रहा है या वो पूर्ण रूप से शत्रुता निभाने पर आ चुका है तो ऐसे मे हम आपको एक ऐसा टोटका बताएँगे जिसे शत्रु मरण टोटका कहां जाता है। जी हाँ जिसके प्रयोग से आपके शत्रु की मृत्यु तक हो जाती है। तो इसलिए बहुत ध्यान रखे की आपसी लड़ाई-झगड़ों को बातों के माध्यम से सुलझा ले ताकि स्थिति हद से ज्यादा बिगड़ न जाए। तो चलिए जानते है वो उपाय। जिसे करने के लिए आपको एक चमगादड़ चाहिए होगी। चमगादड़ मिल जाने के बाद उसे मार कर आप उसकी हड्डी निकाल ले। बाकी का मरा शरीर वही दफ़न कर दे जहां से वो आपको मिली है। अब घर ...

परकाया प्रवेश सिद्धि योगा, जानिए

अनुशासन पर्व’ में ही कथा आती है कि एक बार इन्द्र किसी कारण वश ऋषि देवशर्मा पर कुपित हो गये। उन्होंने क्रोधवश ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा का शिष्य ‘विपुल’ योग साधनाओं में निष्णात और सिद्ध था। उसे योग दृष्टि से यह मालूम हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु पत्नी से बदला लेने वाले हैं। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु पत्नी के शरीर में उपस्थित होकर इन्द्र के हाथों से उन्हें बचाया। पातंजलि योग दर्शन’ में सूक्ष्म शरीर से आकाश गमन, एक ही समय में अनेकों शरीर धारण, परकाया प्रवेश जैसी अनेकों योग विभूतियों का वर्णन है।  मरने के बाद सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तो उसके साथ अन्य सूक्ष्म परमाणु कहिए या कर्म भी गमन करते हैं जो उनके परिमाप के अनुसार अगले जन्म में रिफ्लेक्ट होते हैं, जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि। इस सूक्ष्म शरीर को मरने से पहले ही जाग्रत कर उसमें स्थिति हो जाने वाला व्यक्ति ही परकाय प्रवेश सिद्धि योगा में पारंगत हो सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह कि खुद के शरीर पर आपका कितना कंट्रोल है? योग अनुसार जब तक आप खुद...

डाकिनी तंत्र

डाकिनी तंत्र को अनुसार मूलाधार को चारों रक्तिम दल चार देवियो के प्रतीक है जो मूलाधार की देवियां मानी जाती है । इनमे शौर्य पराक्रम, आक्रामक, प्रवृत्ति, भौतिक शक्ति, शत्रुदमन, क्रियाशीलता, भुभुक्षा, आदि गुण है। इन दलो पर उन देवियों के बीजमंत्र लिखे हुए है। इस ध्वनि के विशेष सस्वर पाठ से या मानसिक पाठ से इन्हें ध्यान लगाकर उद्वेलित किया जा सकता है, इससे ये देवियाँ जाग्रत हो जाती है इससे साधक मे इन गुणों की तीव्रता उत्पन्न हो जाती है पीले रंग का धरातल भोग का भौतिकवाद है । यह लक्ष्मी का प्रतीक है । धन, ऐश्वर्य, भोग, भूमि, अधिकार आदि इनकी प्रवृत्तियां है। यहां से वह शक्ति उद् भव होती है, जो भोग को भौतिक रूप की प्राप्ति से लिए क्रियाशील होती है । त्रिभुज की तीनों भुजाएँ त्रिपुर भैरवी या त्रिपुरसुन्दरी है, अर्थात कामनां, तृष्णा और भोगेेच्छा! ये हमेशा जवान रहती है इसलिए इन्हें त्रिपुरसुन्दरी कहा जाताहै । त्रिकोण के मध्य मे डाकिनी का निवास होता है । जिसे रक्तवर्ण नेत्रों वाली यानि तामसी पशुजनों, के मन मे भय उत्पन्न करने वाली (अर्थात पशु भाव वालो के मन मे) दाहिने हाथ मे शुल्क और खडग तथा बाये...

दिव्य दृष्टि (श्रीहनुमान)

दिव्य दृष्टि (श्रीहनुमान) साधना- यह साधना अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन है।इस साधना के माध्यम से साधक किसी भी मृत आत्मा,भूत प्रेत आदि इतरयोनियों को आज्ञा चक्र से देख सकता है,अनुभव कर सकता है,उनसे मानसिक रूप से वार्तालाप कर सकता है। इस साधना का सम्बंध आज्ञा चक्र से होता है। साधक हनुमानजी की इस दिव्य दृष्टि साधना को सिद्ध करने के बाद आंखे बंद करकेआज्ञा चक्र पर ध्यान केंद्रित करके जब मानसिक रूप से अपने आसपास की आत्माओं को बुलाता है तो यदि आत्मा उस समय वहां उपस्थित होगी तो तुरंत साधक के आज्ञा चक्र में प्रकट होगी । सभी साधको को अलग अलग रूपो में आत्मायें दिखाई देती हैं जैसे एक ही आत्मा किसी साधक को काली परछाई के रूप में दिखेगी तो किसी को पूर्ण वस्त्र पहने हुये। जिन साधको का आज्ञा चक्र विकसित नही होता है और वे खुली आँखों से आत्माओं जैसे अप्सरा,कर्णपिशाचीनी,परी, जिन्न, प्रेत,यक्षिणी आदि को देखने की जिजीविषा रखते है तो ऐसे साधको की स्थिति मृगमरीचिका की तरह होती है,हिरण की कस्तूरी की तरह होती है। ऐसे साधको को साधना के बड़े बड़े अनुभव होते है किंतु न तो देवी देवता आदि उनको आज्ञा चक्र में दर्शन देते है औ...

ब्रह्मचक्र

ब्रह्मचक्र -महाशिवरात्रि के इस पर्व पर लगभग 108 ब्रह्मचक्र को तैयार किया जायेगा। इस सुरक्षा चक्र में काली देवी लक्ष्मी देवी सरस्वती देवी,त्रिदेव शक्ति ब्रह्मा विष्णु महेश को मन्त्र अनुष्ठान के माध्यम से चक्र में सभी शक्तियो को प्रवेश कराकर सिद्ध ब्रह्मचक्र का निर्माण किया जाता है। इस चक्र में भूत दाना,प्रेतदाना,चुडेल दाना ,आदि शक्तियो से सिद्ध किया जाता है। सिद्ध होने के बाद चक्र जाग्रत अवस्था में आ जाता है जिसे गले में काले धागे में धारण किया जाता है। ब्रह्मचक्र धारणकर्ता की पर्याप्त सुरक्षा होती है।उसको कोई भी वाह्य शक्ति नुकसान नही कर सकती है। भूत,प्रेत,भटकती आत्माए,इतर योनियाँ,काला जादू,तांत्रिक मुठकरनी, चौकी, लाट, जिन,जिब्राएल,परी दोष,गढ़ंत दोष,पिशाच,ब्रह्मराक्षस,डाकिनी,शाकिनी,ओपरे,नजर आदि हवाएँ इस चक्र से ट कराकर वापस चली जाती है और धारणकर्ता से दूर हो जाती है। जिन साधको को मन्त्र जाप के समय सुरक्षा का भय बना रहता है ,इसको धारण कर सकते है , किन्तु सिद्धि के समय उनको आवाजे सुनाई दे सकती है या कोई दृश्य दिख सकता है किन्तु डरे नही ,वह आपसे दूर होगी । जिन लोगो को शारीरिक बीमारी...

शरीर क्रिया मन्त्र पराविज्ञान

शरीर क्रिया मन्त्र पराविज्ञान लाइलाज रोगों से मुक्ति- इस मंत्र विद्या के माध्यम से किसी भी रोग का निदान संभव है। रक्त से सम्बंधित रोग ,माँसपेशियों से जुड़े रोग,अस्थियों से जुड़े रोग,किडनी से जुड़े रोग,ह्रदय से जुड़े रोग,नाड़ियों से जुड़े रोग,लिवर से जुड़े रोग,मस्तिष्क से जुड़े रोग,नसों का ब्लॉकेज खोलना ,पुराने दर्द,किसी भी तरह के ज्वर को ठीक करना अर्थात समस्त साध्य और असाध्य बीमारियों को ठीक किया जाता है। देवी या देवता के वचन के अनुसार साधक किसी भी मनुष्य की बीमारियों को अपने शरीर मे लेता है और रोगी कुछ ही मिनटों में ठीक हो जाता है।साधक की बीमारी को मन्त्र के देव या देवता गृहण कर लेते है हैं।।जिसमे साधक को 7 मिनट का कष्ट होता है जैसे किसी को गले का कैंसर है तो साधक मन्त्र शक्ति से उसके थ्रोट कैंसर को अपने गले मे कल्पना करता है तो देवी या देवता उस बीमारी को साधक के गले मे पहुँचा देते है उस अवस्था मे साधक को 7 मिनट तक गले मे केंसर की पीड़ा होगी और रोगी केंसर मुक्त होगा।।यह शक्ति सभी तरह के कैंसर में कार्य करती है किन्तु जिनका ऑपरेशन हो चुका है उनको देर में आराम होता है। इस विद्या के सिद्ध को न कि...

शक्तिपात दीक्षा

शक्तिपात दीक्षा (अमृत कुंडलिनी )साधना= इस शक्ति के माध्यम से मनुष्य के शरीर के सभी चक्रों में अपार ऊर्जा का संचार होता है सबसे पहले मूलाधार चक्र से अमृत को उठाकर सहस्त्र धार चक्र की ओर ले जाया जाता है इसके बाद अमृत अर्थात वीर्य सहस्रार चक्र में पहुंचकर अमृत रूपी रसायन में बदल जाता है इसके बाद अमृत रूपी रसायन इडा पिंगला सुषुम्ना नाड़ी में प्रवाहित होता है इन तीनों नाडि यो से 12 नाडियो में प्रवाहित होता है इसके बाद 108 नाड़ियों में अमृत रूपी रसायन प्रवाहित होता है! 108 नाड़ीयो में प्रवाहित होने के बाद इसको 72000 नाड़ीयो में पहुंचाया जाता है इसी तरह मूलाधार से विशुद्ध चक्र में प्रवाहित किया जाता है इसी तरह मूलाधार से अनाहत चक्र हृदय चक्र में प्रवाहित किया जाता है इसी तरह मूलाधार से मणिपुर चक्र में प्रवाहित किया जाता है इसी तरह मूलाधार से स्वाधिष्ठान चक्र में प्रवाहित किया जाता है इन सभी चक्रों का संबंध इडा पिंगला सुषुम्ना नाड़ी ओं से होता है सभी चक्रों द्वारा अमृत स्त्राव 72000 नाडियो के माध्यम से संपूर्ण शरीर में पहुंच जाता है इसके द्वारा शरीर में उत्पन्न सभी बीमारियां समाप्त हो जाती हैं...