शत्रु विद्वेषण मंत्र शाबर मंत्र १) “ओम उल्लूकाना विद्वेषय फट” .. इस मंत्र का जाप १००० दफा करें उल्लू के पंख को सामने रखकर | अब इस पंख को आप अपने शत्रु के घर पर फेंक दें वहां पर विद्वेषण हो जाएगा |२) “नृसिंहाय वीद्यहे, बज्र नखाय धि मही तान्नो नृसहीं प्रचोदयात |” यह मंत्र जपे प्रतिदिन सूर्योदय के पूर्व | इसका प्रभाव आपके शत्रु को कभी भी षड्यंत्र नहीं करने देगा आपके विरुद्ध |३) मां काली की आराधना करें | यह आप रविवार को पड़ने वाली अमावस्या के दिन करें | इसके लिए सबसे पहले एक काले कपड़े के ऊपर मां की मूर्ति को विराजें | ध्यान रहे मूर्ति का चेहरा उत्तर दिशा की ओर रहे | अब आप साधारण विधि से मां की पूजा करें | पूजा पूरी हो जाने पर अपने दुश्मन के नाम को लिखे एक नींबू पर और साथ ही साथ मां से शत्रु -मुक्ति के लिए प्रार्थना करें | अब रुद्राक्ष/ मूंगे / काले हकीक की माला से नीचे दिए गए मंत्र का जाप करें | जाप-माला की संख्या होनी चाहिए ११ माला | हर एक माला जाप संपन्न होने पर काली मां के सामने रखे हुए निंबू पर दाल चढ़ाएं उड़द की | जाप संख्या पूरी हो जाने के बाद इस नींबू को किसी मिट्टी की हंडिया में डाल दे और काला कपड़ा (जिसमें मां काली को विराजमान किया गया था) से बांध दे मटकी का मुहँ | अब इसे गाड़ दें किसी सुने स्थान पर | शत्रु शमन के इस टोटके के बाद शत्रु अपनी शत्रुता भूल जाएगा | मंत्र है–”क्री क्रीं शत्रु नाशिनी क्री क्रीं फट “४) जिन दो व्यक्तियों का आपस में संबंध विच्छेद करना हो उन दोनों की फोटो या पहने हुए कपड़े के टुकड़े या दो छोटे पत्थर ले लें | अब बुधवार की मध्यरात्रि में इन्हें अपने सामने किसी पात्र में रखे और उनपर काजल से नाम लिखें उन व्यक्तियों का अलग अलग | अब नीचे दिए गए शाबर मंत्र का जाप करें २१ माला का काले हकीक /गधे के दांतो की माला से | आसन का रंग काला रखें और जाप लगातार तीन दिन तक करें | जाप समाप्त होने के पश्चात चौथे दिन माला, कपड़ा / फोटो / पत्थर को विसर्जित कर दे पानी में | लेकिन, ध्यान रहे दोनों व्यक्तियों की यह समान एक दूसरे के विपरीत दिशा की ओर विसर्जित करें | मंत्र हैं –”ओम् खं फलाने (नाम) को फलाने (नाम) से विद्वषय विद्वषय मारजटा आदिपुरुषाय हूं “
स्तंभन तंत्र प्रयोग: स्तंभन क्रिया का सीधा प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ता है। बुद्धि को जड़, निष्क्रय एवं हत्प्रभ करके व्यक्ति को विवेक शून्य, वैचारिक रूप से पंगु बनाकर उसके क्रिया-कलाप को रोक देना स्तंभन कर्म की प्रमुख प्रतिक्रिया है। इसका प्रभाव मस्तिष्क के साथ-साथ शरीर पर भी पड़ता है। स्तंभन के कुछ अन्य प्रयोग भी होते हैं। जैसे-जल स्तंभन, अग्नि स्तंभन, वायु स्तंभन, प्रहार स्तंभन, अस्त्र स्तंभन, गति स्तंभन, वाक् स्तंभन और क्रिया स्तंभन आदि। त्रेतायुग के महान् पराक्रमी और अजेय-योद्धा हनुमानजी इन सभी क्रियाओं के ज्ञाता थे। तंत्र शास्त्रियों का मत है कि स्तंभन क्रिया से वायु के प्रचंड वेग को भी स्थिर किया जा सकता है। शत्रु, अग्नि, आंधी व तूफान आदि को इससे निष्क्रिय बनाया जा सकता है। इस क्रिया का कभी दुरूपयोग नहीं करना चाहिए तथा समाज हितार्थ उपयोग में लेना चाहिए। अग्नि स्तंभन का मंत्र निम्न है। ।। ॐ नमो अग्निरुपाय मम् शरीरे स्तंभन कुरु कुरु स्वाहा ।। इस मंत्र के दस हजार जप करने से सिद्धि होती है तथा एक सौ आठ जप करने से प्रयोग सिद्ध होता है। स्तंभन से संबंधित कुछ प्रयोग निम्नलिखित है: 1....
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