धूम्रा मतिव सतिव पूर्णात सा सायुग्मे | सौभाग्यदात्री सदैव करुणामयि: || “हे आदि शक्ति धूम्र रूपा माँ धूमावती आप पूर्णता के साथ सुमेधा और सत्य के युग्म मार्ग द्वारा साधक को सौभाग्य का दान करके सर्वदा अपनी असीम करुणा और ममता का परिचय देती हो.... आपके श्री चरणों में मेरा नमस्कार है |” “धूम्रासपर्या कल्प पद्धति” से उद्धृत इस श्लोक से ही माँ धूमावती की असीमता और विराटता को हम सहज ही समझ सकते हैं | बहुधा साधक जब जिज्ञासु की अवस्था में होता है तब वो भ्रांतियों का शिकार होता है,अब ऐसे में या तो वो मार्ग से भटककर पतित हो जाता है,या फिर सद्गुरु के श्री चरण कमलों का आश्रय लेकर सत्य से ना सिर्फ परिचित हो जाता है अपितु उस पर निर्बाध गति करते हुए अपने अभीष्ट लक्ष्य को भी प्राप्त कर लेता है | माँ धूमावती की साधना को जटिल और अहितकर या विनाशकारी क्यूँ मानते हैं” ? माँ का कोई भी रूप अहितकर होता ही नहीं है ,महोदधि तन्त्र मैं कहा जाता है की देवी धूमावती महा विधा हर प्रकार की दरिद्रता नाश के लिए ,तन्त्र मंत्र , जादू टोना , बुरी नजर , भुत,प्रेत , सभी का समन के लिए भय से मुक्ति के लिए , सभी रोग शोक समाप...